मध्‍यप्रदेश विधान सभा पुस्‍तकालय
                                                                                                                                                                                            पुस्तकालय नियमावली
                                                                                                                                                             पुस्तक क्रय नीति
              1 नवम्‍बर, 1956 को राज्‍य विलीनीकरण पश्‍चात् विन्‍ध्‍यप्रदेश, भोपाल, मध्‍यभारत की विधान सभाओं से साहित्‍य एकत्रित कर यह पुस्‍तकालय प्रारम्‍भ किया गया ।
              विधान सभा के माननीय सदस्‍यों को उनके विधायी कार्यों के सम्‍यक निर्वहन में सहायता देने हेतु ग्रंथालय प्रयासरत है । आधुनिक युग में बढ़ते हुए ज्ञान विज्ञान के साथ दिनों दिन पुस्‍तकालय का विकास तेजी से हो रहा है, मानव द्वारा अर्जित ज्ञान का लेखबद्ध विवरण हमें पुस्‍तकों के माध्‍यम से ही मिलता है। समाज के सर्वोन्‍मुखी विकास में पुस्‍तकालय का महत्‍वपूर्ण योगदान है ।
 पुस्‍तकालय का उपयोग म.प्र. राज्‍य का प्रतिनिधित्‍व करने वाले संसद सदस्‍य, सचिवालय के अधिकारी/कर्मचारी, पत्रकारदीर्घा के प्रवेश पत्र धारक, पत्र प्रतिनिधि, शोधार्थी, के साथ सत्रान्‍तर काल में राज्‍य के राजपत्रित अधिकारी  करते हैं । पूर्व माननीय सदस्‍यों को पुस्‍तकालय में बैठकर अध्‍ययन की सुविधा भी है ।
          विधानसभा पुस्‍तकालय का मुख्‍य उद्देश्‍य विधायकों के बौद्धिक, तथा मानसिक विकास के साथ-साथ संसदीय कार्यों में सहायता प्रदान करना है साथ ही शोध एवं संदर्भ सामग्री उपलब्‍ध कराने में सहयोग प्रदान करता है ।
          पुस्‍तकालय का प्रयोग करने वाले पाठकों, पाठ्य सामग्री, प्रलेख नियोजन के आधार पर पुस्‍तकालय के विभिन्‍न प्रकार है, विधान सभा पुस्‍तकालय का स्‍थान, विशेष पाठक (माननीय सदस्‍य) विशेष पाठ्य सामग्री तथा नियोजन विशेष पद्धितियों के आधार पर होने के कारण विशेष पुस्‍तकालयों में आता है ।





पुस्‍तकालय प्रथम तल (अध्‍ययनकक्ष, गांधी नेहरू कक्ष एवं स्‍टाफ कक्ष)  


          इन्दिरा गांधी विधान भवन (नवीन विधान सभा) के प्रथम तल क्रमांक 224 में पुस्‍तकालय, अनुसंधान तथा संदर्भ शाखा स्‍थापित है ।
              पुस्‍तकालय के मुख्‍यद्वार से प्रवेश करते ही डिस्‍प्‍ले बोर्ड पर मध्‍यप्रदेश विधान सभा ''प्रक्रिया तथा कार्य संचालन'' सम्‍बन्‍धी पुस्तिकाएं प्रदर्शित की गई है, यहीं पर कैटलॉग कैबिनेट जिसमें पुस्‍तकें शीर्षकानुसार, वर्गीकरण अनुसार, लेखक अनुसार की जानकारी है । यहीं पर माननीय सदस्‍यों के अध्‍ययन हेतु अध्‍ययन कक्ष स्‍थापित है, यहां पर माननीय सदस्‍यों की सुविधा हेतु सदन की कार्यवाही का वृतांत श्रृव्‍य रूप (स्‍पीकर लगा है) से कराया जाता है एवं समाचार पत्र इत्‍यादि एवं नवीनतम पुस्‍तकें प्रदर्शित की जाती है । महापुरूषों के आकर्षक, भव्‍य तैलचित्र लगे हुए है, इसी तल पर गांधी-नेहरू कक्ष तथा विधान सभा का मॉडल भी स्‍थापित है । अध्‍ययन कक्ष में ही पुस्‍तकों के इश्‍यू-रिटर्न काउन्‍टर की व्‍यवस्‍था भी की गई है ।


 
 
 
अध्‍ययन कक्ष





विधान सभा का मॉडल





गांधी नेहरू कक्ष


          इस कक्ष में बाहर महात्‍मा गांधी एवं पं. जवाहरलाल नेहरू की भव्‍य आदमकद तैलचित्र ग्‍लासडोर में स्‍थापित है । प्रतिवर्ष 2 अक्‍टूबर (गांधी जयन्‍ती) को सचिवालय द्वारा माल्‍यार्पण एवं दीप प्रज्‍जवल का कार्यक्रम किया जाता है ।


 
महात्‍मा गांधी एवं पं. जवाहरलाल नेहरू का आदम कक्ष तैलचित्र


          राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी एवं पं. जवाहरलाल नेहरू की याद में उन पर लिखित महत्‍वपूर्ण लेखकों की रचनाएं, आत्‍मकथा, भाषण, पत्रों का संकलन, गांधी वाड.मय, ट्रान्‍सफर ऑफ पावर (1942-47) हरिजन, यंग, इंडिया जिसका संपादन गांधी जी स्‍वयं किया करते थे तथा उनके निज सचिव/सहायक श्री प्‍यारेलाल जी द्वारा लिखित पुस्‍तकों का संग्रह किया गया है ।
          इस कक्ष में भारत का संविधान (संविधान सभा के माननीय सदस्‍यों के हस्‍ताक्षरयुक्‍त) लोकसभा की प्रथम दिवस की कार्यवाही, मध्‍यप्रदेश विधान सभा की प्रथम दिवस की कार्यवाही, हैण्‍डरिटर्न (हस्‍तलिखित) डिवेट सी.पी.वरार (1914), पार्लियामेन्‍ट्री हिस्‍ट्री इंग्‍लैण्‍ड प्रथम भाग, पार्लियामेन्‍ट्री डिवेट 1803-1804, सी.ए. डिवेट आफिशियल रिपोर्ट 14 अगस्‍त, 1947 आजादी के समय महापुरूषों पर लिखी महात्‍मा गॉंधी पर वांड.मय (100 भाग) पुस्‍तकें, पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम द्वारा पुस्‍तकालय को भेंट की गई हस्‍ताक्षरित पुस्‍तकें, भृगु संहिता तथा भारत की विकास यात्रा 1947-2008, से सम्‍बन्धित इत्‍यादि पुस्‍तकें इस कक्ष में संग्रहित है। इसी कक्ष में गांधीजी का प्रिय चरखा  एवं श्रीमद् भागवत् गीता को  प्रदर्शित किया गया है ।
          प्रथम तल पर ही पुस्‍तकालय से जुड़े अधिकारी, संचालक, अनुसंधान अधिकारी, पुस्‍तकालय, पुस्‍तकालय स्‍टाफ एवं कम्‍प्‍यूटर कक्ष स्‍थापित है ।
          स्‍टाफ कक्ष में मैन्‍युअल, अधिनियम के कम्‍पाइलेशन एवं पुस्‍तकें, लोकसभा, राज्‍यसभा, विधानसभा सदस्‍यों के जीवन परिचय सम्‍बन्‍धी पुस्‍तकें, संदर्भ पुस्‍तकें इत्‍यादि संग्रहित है । स्‍टाफ कक्ष से लगे हुए कक्ष में राज्‍यपाल, वित्‍तमंत्री के भाषण, मुख्‍यमंत्रियों एवं मंत्रिमण्‍डल का सम्‍पत्ति विवरण, लोकसभा के प्रकाशन, अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग की रिपोर्ट, विधेयक, मध्‍यप्रदेश के महत्‍वपूर्ण समिति एवं आयोग प्रतिवेदन इत्‍यादि साहित्‍य रखा है । पुस्‍तकाध्‍यक्ष कक्ष में समाचार पत्र (मासिक) एवं कम्‍प्‍यूटर स्‍थापित है ।





 
   
पुस्‍तकालय के अपर मेजेनाइन एवं लोअर मेजेनाइन पर रखा साहित्‍य



पुस्‍तकालय का साहित्‍य


          पुस्‍तकालय में रखी पुस्‍तकें एवं साहित्‍य अपर तथा लोअर मेजेनाइन पर शेल्‍फों में जमा हुआ है । पुस्‍तकें डी वी डेसीमल क्‍लासीफिकेशन के अनुसार व्‍यवस्थित हैं । पाठकगणों की सुविधा के लिये पुस्‍तकों की मार्गदर्शिका (मैप) भी लगा है । अपर तथा लोअर मेजेनाइन पर अध्‍ययन की सुविधा भी उपलब्‍ध है ।
          पुस्‍तकालय में लगभग 1 लाख 82 हजार पठन सामग्री वैज्ञानिक ढंग से व्‍यवस्थित कर उपलब्‍ध है, पुस्‍तकालय में निरंतर साहित्‍य बढ़ रहा है । इसके साथ मध्‍यप्रदेश के पुनर्गठन के पूर्व चारों राज्‍यों से प्राप्‍त होने वाले साहित्‍य को एकत्रित कर सुरक्षित रखा गया है । पुस्‍तकालय में बुलाई जानेवाली नियतकालिक पत्रिकाओं की संख्‍या 61 है जिसमें 49 सशुल्‍क एवं 12 नि:शुल्‍क है, पुस्‍तकालय में देश-प्रदेश के 29 समाचार पत्र व 21 पत्रिकाएं भी बुलवाई जाती है । सत्रकाल में विधायक विश्राम गृह में 5-5 समाचार पत्र माननीय सदस्‍यों के अध्‍ययन हेतु रखे जाते हैं ।  संसदीय ज्ञान को विकसित एवं समृद्धशाली बनाये रखने हेतु विदेशों से प्रकाशित जर्नल्‍स भी क्रय किए जाते है ।
          पुस्‍तकालय के अपर मेजेनाइन पर लोकसभा, राज्‍यसभा, विभिन्‍न विधानसभाओं की कार्यवाहियॉं, प्रतिवेदन, रिपोर्ट्स, जर्नल्‍स, ऑंकड़े, हैण्‍डबुक, डायरेक्‍ट्री, नक्‍शे, चित्रकला, मूर्तिकला, वास्‍तुकला, ज्‍योतिष, मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न जिलों के नक्‍शे, गजेटियर, मूर्धन्‍य रचनाकारों की रचनावली, ग्रंथावली, भाषणों का संकलन, विभिन्‍न विषयों इतिहास, राजनीति, भूगोल, समाजशास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र, विधानसभा लोकसभा चुनाव परिणाम, कानूनी पुस्‍तकें, उर्दू, मराठी पुस्‍तकें, काव्‍य संग्रह, उपन्‍यास, कहानी, नाटक, शब्‍दकोश, विश्र्वकोष, कहावतें-लोकोक्तियॉं इत्‍यादि पुस्‍तकों का संग्रह है ।
          पुस्‍तकालय के लोअर मेजेनाइन पर भारत राजपत्र, मध्‍यप्रदेश राजपत्र, मध्‍यभारत राजपत्र, मध्‍यप्रदेश बजट, विभिन्‍न विभागों के प्रतिवेदन, जर्नल्‍स, पत्रिकाऐं, समाचार पत्र, अन्‍य राज्‍यों की कार्यवाहियॉं, आजादी के पूर्व के कोड मैन्‍युअल, लोकसभा अधिनियम, विधेयक, धार्मिक पुस्‍तकें, जिला बजट, प्रश्‍नोत्‍तर साहित्‍य 1957 से निरन्‍तर, रखे गए है । पुस्‍तकालय में कम्‍पेक्‍टर्स स्‍थापित है जिसमें दुर्लभ साहित्‍य, हैंसर्ड पार्लियामेन्‍ट्री हिस्‍ट्री, जनगणना के ऑंकड़े, धार्मिक पुस्‍तकें, जिल्‍दबंदी साहित्‍य, पुस्‍तकालय प्रश्‍नोत्‍तर परिशिष्‍ट रखे हैं ।


                                                               पुस्‍तकालय में उपलब्ध दुर्लभ पुस्‍तकों,जर्नल्‍स,पत्रिकाओं,समाचार पत्रों की सूची


मध्‍यप्रदेश विधान सभा प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली के अंतर्गत
पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ समिति का गठन
समिति का गठन. 233.  (1)  अध्यक्ष, पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ से संबंधित विषयों पर मंत्रणा देने के लिए उतने सदस्‍यों की एक पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ समिति नियुक्‍त करेगा, जितने कि वह आवश्‍यक समझे.
  (2)   समिति का कार्यकाल एक वर्ष होगा किन्‍तु नवीन समिति के गठित होने तक पूर्ववर्ती समिति कार्यरत रहेगी.
समिति के कृत्‍य 233-क.   समिति के कृत्य निम्नानुसार होंगे -
   (1)  पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ शाखा की उन्‍नति के लिये सुझावों पर विचार करना;
 (2)  पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ शाखा द्वारा दी गई सेवाओं से पूरा-पूरा लाभ उठाने में विधान सभा सदस्‍यों की सहायता करना;                                                       
  (3)  पुस्‍तकालय, अनुसंधान एवं संदर्भ से संबंधित ऐसे विषयों पर विचार करना और मंत्रणा देना जो सभा द्वारा अथवा अध्‍यक्ष द्वारा समय-समय पर विशिष्‍ट रूप से सौंपे जायें; और
  (4)  प्रदेश हित के मामलों पर आवश्यक पठन सामग्री/जानकारी संबंधित विभाग से बुलाई जाकर सदस्यों को उपलब्ध कराना तथा आवश्यकता होने पर विभागीय अधिकारियों का मौखिक साक्ष्य लेना.
                                               



मध्‍यप्रदेश विधानसभा


      विधान सभा का गठन एक नवम्‍बर 1956 को मध्‍यप्रदेश राज्‍य के गठन के साथ ही हुआ था. मध्‍यप्रदेश का निर्माण तत्‍कालीन मध्‍यप्रदेश, मध्‍यभारत, विंध्‍यप्रदेश और भोपाल राज्‍य को मिलाकर हुआ था. इसी तर्ज पर इन चार राज्‍यों की विधान सभाओं का एकीकरण मध्‍यप्रदेश विधान सभा के रूप में हुआ. विंध्‍यप्रदेश विधान सभा के 60, भोपाल विधान सभा के 30, मध्‍यभारत विधान सभा के 99 और सी.पी.एंड बरार (पुराना मध्‍यप्रदेश) विधान सभा के 150 सदस्‍यों को मिलाकर एकीकृत विधानसभा के सदस्‍यों की संख्‍या 339 थी. नये मध्‍यप्रदेश की इस विधान सभा का पहला सत्र 17 दिसम्‍बर, 1956 से 17 जनवरी, 1957 की अवधि में संपन्‍न हुआ.
नये मध्‍यप्रदेश के पहले राज्‍यपाल डॉ. भोग राजु पट्टाभिसीतारमैया एवं मुख्‍यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्‍ल थे. पुनर्गठित पहली विधान सभा के अध्‍यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे, उपाध्‍यक्ष श्री विष्‍णु विनायक सर्वटे और विरोधी दल के नेता श्री विश्‍वनाथ यादवराव तामस्‍कर थे.
     नया मध्‍यप्रदेश लगभग 3 लाख 43 हजार 450 वर्गमीटर क्षेत्रफल का था जो इंग्‍लैण्‍ड, जर्मनी या जापान देश के क्षेत्रफल से तो अधिक था ही वह भारत का भी सबसे बड़ा प्रदेश था सन् 1956 में बने इस नये प्रदेश में 74 देशी रियासतों का इलाका शामिल था. गठन के समय प्रदेश में 41 जिले थे, प्रदेश की सीमा भारत के सात अन्‍य प्रदेशों क्रमश: आन्‍ध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र गुजरात,राजस्‍थान, उत्‍तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा की सीमाओं से मिलती थी. बस्‍तर जिला प्रदेश का सबसे बड़ा जिला था जिसका क्षेत्रफल 39 हजार 176 वर्ग किलोमीटर था जो केरल प्रदेश के क्षेत्रफल से 307 वर्ग किलोमीटर अधिक था.


भोपाल को नये मध्‍यप्रदेश की राजधानी बनाये जाने की घोषणा के बाद नई दिल्‍ली से लौटकर आये डॉ. शंकर दयाल शर्मा
का
भोपाल रेल्‍वे स्‍टेशन पर आत्‍मीय स्‍वागत. चित्र में सफेद साफे में डॉ. शर्मा के पिता श्री खुशीलाल वैद्य भी दृष्‍टव्‍य हैं.



     राज्‍य पुनर्गठन आयोग ने राजधानी के लिये जबलपुर का नाम सुझाया था. उसकी स्थिति सचमुच में केन्‍द्रीय थी. भोपाल जानता था कि अपने छोटे आकार के कारण वह स्‍वतंत्र इकाई तो रह नहीं सकता इसलिये भोपाल के मुख्‍यमंत्री, डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने भोपाल को राजधानी बनाने के लक्ष्‍य पर ध्‍यान केन्द्रित किया. दिनॉंक 9 अक्‍टूबर, 1955 में प्रहरी को एक साक्षात्‍कार देते हुए उन्‍होंने कहा था राजधानी के प्रश्‍न का निपटारा करते   समय  सरकारी कामों के लिये बिल्डिंग का प्रश्‍न   प्रमुख रहेगा.  दूसरे स्‍थानों की   अपेक्षा भोपाल इस मामले में काफी भाग्‍यशाली है. सचिवालय आदि कार्यालयों के लिये इमारतों की संख्‍या काफी  है.  


भोपाल को नये मध्‍यप्रदेश की राजधानी बनाने के फैसले के बाद नये प्रदेश के मनोनीत मुख्‍यमंत्री पं. रविशंकर शुक्‍ल
को भोपाल
की भौगोलिक विशेषताओं से अवगत कराते हुए तत्‍कालीन भोपाल राज्‍य के मुख्‍यमंत्री डॉ. शंकर दयाल शर्मा.
चित्र में पं. श्‍यामाचरण
शुक्‍ल और श्री नरसिंहरा दीक्षित भी दृष्‍टव्‍य हैं.


आवश्‍यकता पड़ने पर नवाब के अहमदाबाद की इमारतें प्राप्‍त  हो सकती है. डॉ. शर्मा की दलील को नकारा नहीं जा सकता. यह एकदम सच है, इसलिये जब केन्‍द्रीय नेतृत्‍व ने राजधानी का  निर्णय किया तो भवनों के कारण भी भोपाल का पलड़ा भारी रहा. लेकिन केवल ही एक कारण नहीं था. डॉ. शर्मा के मुख्‍यमंत्रित्‍व  काल में केन्‍द्रीय सरकार, विशेषकर नेहरू जी बहुत प्रभावित थे. लेकिन एक बड़ा राजनीतिक कारण भी केन्‍द्र के नेतृत्‍व को  प्रभावित कर रहा था. भोपाल नवाब ने अंत तक भारत विलय का विरोध किया. उनका पाकिस्‍तान के प्रति रुझान संदेहास्‍पद बना  रहा. इसलिए भी भोपाल को राजधानी के लिये चुना गया.
     जब तय हो गया कि नया मध्‍यप्रदेश गठित किया जायेगा, तो मुख्‍यमंत्रियों तथा मुख्‍य सचिवों की नागपुर, इन्‍दौर, ग्‍वालियर और रीवा में अनेक बैठकें हुई. इनमें नये राज्‍य की भावी प्रशासनिक व्‍यवस्‍था के बारे में अनेक निर्णय लिये गये.
 
     23 और 24 जुलाई, 1956 को नागपुर में मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री पं. रविशंकर शुक्‍ल, मध्‍यभारत के श्री तख्‍तमल जैन, विन्‍ध्‍यप्रदेश के श्री शम्‍भुनाथ शुक्‍ल तथा भोपाल के डॉ. शंकर दयाल शर्मा की दो दिवसीय बैठक  हुई.  इसमें  सात   कमिश्‍नरी  डिवीजन बनाने का   फैसला किया  गया. 


नये मध्‍यप्रदेश के निर्माण के पूर्व भोपाल आये तत्‍कालीन संयुक्‍त प्रांत के मुख्‍यमंत्री श्री रविशंकर शुक्‍ल द्वारा
विश्‍व विख्‍यात सांची
स्‍तूप के अवलोकन के समय का छायाचित्र. चित्र में तत्‍कालीन भोपाल पार्ट-सी के
मुख्‍यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा, मध्‍यभारत के  
मंत्री श्री गोपीकृष्‍ण विजयवर्गीय, भोपाल स्‍टेट के मंत्री
मौलाना तरजी मशरिकी, रायसेन क्षेत्र के विधायक श्री बाबूलाल कमल भी
दृष्‍टवय है.


ये  थे भोपाल,  जबलपुर,   ग्‍वालियर, इन्‍दौर, रीवा, रायपुर तथा बिलासपुर. डी.आई.जी. के अधीन  छह पुलिस रेंज बनाने तथा श्री के. एफ. रूस्‍तम जी को नये मध्‍यप्रदेश का पुलिस महानिरीक्षक बनाने का निर्णय भी किया गया.
     16 अक्‍टूबर, 1956 को चारों राज्‍यों में चुने हुए कांग्रेसी विधायकों की एक संयुक्‍त बैठक नागपुर विधान सभा भवन में आयोजित की गई. बैठक के अध्‍यक्ष थे तत्‍कालीन पुराना मध्‍यप्रदेश विधान सभा के अध्‍यक्ष पं. कुंजीलाल दुबे. कांग्रेस के 274 विधायकों में 212 सदस्‍य उपस्थित थे. स्‍वाभाविक ही वरिष्‍ठतम नेता पं. रविशंकर शुक्‍ल को सर्वसम्‍मति से नेता चुना गया ।


मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय के तत्‍कालीन मुख्‍य न्‍यायाधीश श्री एम. हिदायत उल्‍लाह नये मध्‍यप्रदेश के प्रथम
राज्‍यपाल डॉ. पट्टाभि
सीतारमैया को मिन्‍टो हाल (पुराना विधान सभा भवन) में 31-10-1956 की मध्‍य रात्रि में
राज्‍यपाल पद की शपथ दिलाते हुए.
मध्‍यप्रदेश के माटीपुत्र श्री हिदायत उल्‍लाह बाद में सुप्रीम कोर्ट के
मुख्‍य न्‍यायाधीश एवं भारत के उप राष्‍ट्रपति भी रहे.


प्रदेश के प्रथम मुख्‍य मंत्री पं. रविशंकर शुक्‍ल को मिंटो हॉल (पुराना विधान सभा भवन) में 1 नवम्‍बर, 1956 को
मुख्‍यमंत्री पद
की शपथ दिलाते हुए महामहिम राज्‍यपाल श्री पट्टाभि सीतारमैया.
 
 
          जब पं. रविशंकर शुक्‍ल 31 अक्‍टूबर को नागपुर से भोपाल पहुंचे तो उनका हजारों लोगों ने स्‍टेशन पर जोरदार स्‍वागत किया. आधी रात को नये मध्‍यप्रदेश के प्रथम राज्‍यपाल, डॉ. पट्टाभि बी. सीतारमैया को मध्‍यप्रदेश हाई कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश  जस्टिस हिदायत उल्‍लाह ने पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी. इसके बाद पं. रविशंकर शुक्‍ल को मध्‍यप्रदेश के प्रथम  मुख्‍यमंत्री की तथा उनके मंत्रिमंडल के सदस्‍यों को शपथ दिलायी गयी. पं. शुक्‍ल को मिलाकर 12 केबिनेट मंत्री और 11 उप मंत्री थे.



1 नवम्‍बर, 1956 की सुबह भोपाल के लाल परेड ग्राउण्‍ड (अब मोतीलाल नेहरू स्‍टेडियम) पर मुख्‍यमंत्री पं. रविशंकर शुक्‍ल का प्रथम उद्बोधन.
          नये मध्‍यप्रदेश के गठन में महाकौशल और पं. रविशंकर शुक्‍ल की महती भूमिका थी. वे अजातशत्रु थे, उदार, विशाल ह्दय,  अपने विरोधियों के प्रति भी स्‍नेह और हमेशा बड़ा और अच्‍छा सोचना उनके जन्‍मजात गुण थे. इसी बड़ी सोच ने उन्‍हें बड़ा मध्‍यप्रदेश बनाने की प्रेरणा दी. वरिष्‍ठ पत्रकार श्री मायाराम सुरजन ने एक प्रसंग का उल्‍लेख किया है. सुरजन जी नये मध्‍यप्रदेश को बेढंगा और अटपटा मानते थे. उन्‍होंने अपना मत पं. शुक्‍ल के सामने प्रकट किया और कहा, यह भी क्‍या राज्‍य है कहीं पैर, कहीं सिर, गणेश जी सा. शुक्‍ल जी ने शांत होकर कहा, ठीक ही कहते हो उन्‍हीं के समान गुण संपन्‍न भी.
          दुर्भाग्‍य से नये मध्‍यप्रदेश का प्रथम मुख्‍यमंत्री मात्र दो माह ही प्रदेश की बागडोर सम्‍हाल सका. एक नवंबर, 1956 को मध्‍यप्रदेश बना और 31 दिसम्‍बर 1956 को वर्ष के अंतिम दिन, दिल्‍ली में मुख्‍यमंत्री पं. रविशंकर का देहावसान हो गया.
मध्‍यप्रदेश के प्रथम राज्‍यपाल महामहिम डॉ. पट्टाभि सीतारमैया 1 नवम्‍बर, 1956 की सुबह लाल परेड ग्राउण्‍ड पर सलामी लेते हुए.
          मध्‍यप्रदेश जैसी समृद्ध एवं सांस्‍कृतिक परंपरा भारत के बहुत थोड़े राज्‍यों को ही प्राप्‍त है. देश के सांस्‍कृतिक जीवन में इसका योगदान भी उतना ही महत्‍वपूर्ण तथा भारतीय जीवन में इसका योग अविस्‍मरणीय तथा अविच्छिन्‍न है.
          सांची तथा भरहुत के विशाल स्‍तूप, त्रिपुरी के भग्‍नावशेष, भव्‍य खजुराहो, ग्‍वालियर किले का मान मंदिर, अटेर का किला, उदयगिरि की गुफाऍ, बाघ-गुफाएं, सुरम्‍य उदयेश्‍वर मंदिर, मंदसौर का स्‍तम्‍भ, उज्‍जैन की वैद्य शाला, मांडू का जहाज महल तथा हिंडोला महल, रूपमती तथा बाजबहादुर का महल, सिरपुर के पुरातत्‍वीय उत्‍खनन तथा राज्‍य में यत्र-तत्र बिखरे हुए अनेक मंदिर, मस्जिद, घाट तथा प्राचीरें भारतीय इतिहास के स्‍वर्णकाल के कीर्ति स्‍तम्‍भ है.
          मध्‍यप्रदेश की साहित्यिक परम्‍परा अत्‍यंत प्राचीन है. इन भागों के संस्‍कृत कवियों ने जो कीर्ति प्राप्‍त की है,  उससे भारतीय काव्‍य को विश्‍व साहित्‍य में एक उल्‍लेखनीय स्‍थान प्राप्‍त हुआ है. कालिदास, भवभूति, वराहमिहिर, सदानंद, मंडन मिश्र तथा गंगाधर आदि संस्‍कृत भाषा के जाज्‍वल्‍यमान कवि हुए हैं. प्राकृत एवं पाली भाषायें भी यहां फली-फूली हैं. आचार्य केशवदास, बिहारी, कुंभनदास, हरिदास, स्‍वामी गदाधर भट्ट, आनंद, गोपालचंद्र, भूषण, छत्रसाल, र्इसुरी, रसनिधि, ठाकुर रघुराजसिंह, पद्माकर और हरिराम व्‍यास ऐसे नाम हैं, जिन्‍होंने हिन्‍दी साहित्‍य को गौरवपूर्ण स्‍थान प्राप्‍त कराने में भारी सहयोग दिया है.
नये मध्‍यप्रदेश की पहली मंत्रिपरिषद 1 नवम्‍बर 1956 को लाल परेड मैदान पर आयोजित एक कार्यक्रम में. चित्र में प्रथम पंक्ति में दायें से बायें रानी पदमावती देवी, मुख्‍यमंत्री पं. रविशंकर शुक्‍ल, श्री नरसिंह राव दीक्षित, श्री मिश्री लाल गंगवाल, श्री शंकरलाल तिवारी, डॉ. शंकर दयाल शर्मा, श्री तखतमल जैन, मौलाना तरजी मशरिकी, श्री व्‍ही.व्‍ही. द्रविड़ और श्री शिवभानु सोलंकी दृष्‍टव्‍य हैं.
          मध्‍यप्रदेश में संगीत की भी समृद्ध परम्‍परा रही है. यहां भारतीय संगीत-जगत के कुछ महान आचार्यों का जन्‍म हुआ है. इनमें विक्रमादित्‍य, नायक गोपाल, बैजू राजा मानसिंह, रायक मक्‍शू, भानु भिक्षु, तानसेन, बाजबहादुर तथा रूपमती के नाम उल्‍लेखनीय हैं, इनका संगीत के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है.
          इस नये राज्‍य में मुख्‍यत: दो मूल के लोग है उत्‍तरी क्षेत्र के लोग जिसके अन्‍तर्गत नर्मदा घाटी भी आती है, अधिकांशत: भारतीय आर्य मूल के हैं तथा दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों के लोगों में गोंड, भील तथा अन्‍य आदिवासी यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं. हिन्‍दी के अतिरिक्‍त जो कि इस राज्‍य की मुख्‍य भाषा है और जो संपूर्ण राज्‍य में बोली और समझी जाती है, अनेक अल्‍पसंख्‍यक समुदायों की भाषाएं एवं क्षेत्रीय बोलियां हैं, जिनमें उर्दू, मराठी, मालवी, निमाड़ी, बुन्‍देलखण्‍डी तथा बघेलखण्‍डी प्रमुख है. आदिवासियों की अपनी अलग बोलियां हैं.
          ऐतिहासिक दृष्टि से इस राज्‍य का अतीत जितना प्राचीन है उतना ही विविधतापूर्ण भी है. भोपाल, होशंगाबाद, पचमढ़ी, छतरपुर तथा रायगढ़ की प्रागैतिहासिक गुफाओं की नक्‍काशी तथा नर्मदा घाटी की खुदाई में प्राप्‍त पाषाण उपकरणों तथा मृदभाण्‍डों के आधार पर इतिहासकार यह विश्‍वास करते हैं कि इस क्षेत्र की सभ्‍यता लगभग 2500 वर्ष पुरानी है. एक लम्‍बी अवधि तक इस कटिबंध में प्राग-नवपाषाण कालीन सभ्‍यता फूली-फली है. ताम्र युग का व्‍यापक प्रभाव भी यहां परिलक्षित होता है. पुराणों में उल्‍लेख मिलता है कि निषाद विन्‍ध्‍य तथा सतपुड़ा के जंगलों में रहते थे तथा आर्यों से उनका संबंध था. महाकाव्‍यों में यादवों तथा उनके वंशजों की कथाओं का वर्णन उपलब्‍ध है. भार्गव राम अर्थात् परशुराम पिता जमदग्नि ऋषि का आश्रम मध्‍यप्रदेश में ही था. भगवान कृष्‍ण तथा सुदामा ने जहां अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्‍त की थी वह संदीपनी आश्रम भी उज्‍जयिनी में ही था. भगवान राम ने वनवास के 14 वर्ष मध्‍यप्रदेश के वनों (दण्‍डकारण्‍य) में व्‍य‍तीत किये थे तथा पांडवों ने भी विन्‍ध्‍य तथा सतपुड़ा के घने वनों में विचरण किया था जिसके प्रमाण भोपाल के निकट भीमबैठका, पचमढ़ी में पाण्‍डव गुफा और पन्‍ना के पास पाण्‍डव प्रपात के रूप में मौजूद है.
          प्रदेश के इतिहास का एक स्‍पष्‍ट चित्र मौर्य काल से प्रारंभ होता है. मौर्यों में सबसे पहले चन्‍द्रगुप्‍त ने संपूर्ण उत्‍तर भारत पर साम्राज्‍य स्‍थापित किया था जिसके अन्‍तर्गत वे क्षेत्र भी थे, जो अब मध्‍यप्रदेश में शामिल हैं. चन्‍द्रगुप्‍त के पश्‍चात् सम्राट अशोक ने भी इस क्षेत्र में कई स्‍तम्‍भ-लेख तथा शिला लेख उत्‍कीर्ण करवाये. मौर्यों के पश्‍चात् शुंगों का आगमन हुआ. पुष्‍यमित्र ने इस राजवंश की नींव डाली. लगभग इसी समय सातवाहनों ने त्रिपुरी तथा मालवा में अपना आधिपत्‍य स्‍थापित किया. इनके बाद कुशाण कर्दकम तथा वाकाटक आये. तत्‍पश्‍चात् भारतीय इतिहास का स्‍वर्ण युग, चन्‍द्रगुप्‍त विक्रमादित्‍य से आरम्‍भ हुआ, जिसने उज्‍जैन में एक नये प्रबुद्ध तथा शक्तिशाली राजवंश की नींव डाली. इसके पश्‍चात् राजवंशों में परिवर्तन होते रहे. सन् 1294 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण मुस्लिम राज्‍य के अधीन मालवा का बहुत सा क्षेत्र आ गया. ऐसे शासकों में, जिन्‍होंने मुगल साम्राज्‍य की अधीनता स्‍वीकार नहीं की थी, गढ़ा (जबलपुर) की रानी दुर्गावती तथा बुंदेलखण्‍ड (छतरपुर) के राजा छत्रसाल प्रमुख थे. राजा छत्रसाल के निमंत्रण पर, प्रथम पेशवा बाजीराव ने मुहम्‍मद बंगश को खदेड़ दिया था, जिसके बदले में पेशवा को बुंदेलखण्‍ड के कुछ जिले जागीर के रूप में मिले थे. मराठा सरदार अर्थात् होल्‍कर, सिंधिया तथा पंवार जैसे-जैसे इन्‍दौर, ग्‍वालियर, देवास, झांसी, धार तथा अन्‍य स्‍थानों की ओर बढ़ते गये वैसे-वैसे अपना प्रभुत्‍व जमाते गये. कालान्‍तर में ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी का प्रभुत्‍व और उसकी हड़प नीति ने इस प्रभाव को समाप्‍त कर दिया.
विलीनीकरण के बाद नये मध्‍यप्रदेश का वर्ष 1956 से 1996 तक विधान सभा भवन रहा भोपाल स्थित - मिन्‍टो हॉल
          राज्‍य के पुनर्गठन के कुछ पहले सितम्‍बर, 1956 में ही नयी एकीकृत विधान सभा के भवन के लिए भोपाल की एक खूबसूरत इमारत मिंटो हाल का चुनाव कर लिया गया था अंग्रेजी राज, नवाबी हुकूमत के दौर और बाद में लोकतंत्रीय शासन के साक्षी मिंटो हॉल की कहानी 12 नवम्‍बर, 1909 से शुरू होती है. तत्‍कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो इस दिन अपनी पत्‍नी के साथ भोपाल आए. भोपाल की शासक नवाब सुल्‍तान जहां बेगम को यह कमी महसूस हुई कि लॉर्ड मिंटो को ठहराने के लिए  भोपाल में कोई अच्‍छा भवन नहीं था. उन्‍होंने तुरत-फुरत एक नायाब इमारत बनवाने का फैसला किया. इस भवन की लागत आई 3 लाख रूपये, लेकिन इसको बनाने में बहुत लम्‍बा वक्‍त लगा. करीब 24 साल. इस नयी इमारत का नाम मिंटो हॉल रखा गया. अतिथि गृह के रूप में मिंटो हॉल का इस्‍तेमाल बहुत कम ही हो पाया.  इस इमारत के भव्‍य हॉल में नवाबी घरानों के लड़के-लड़कियां स्‍केटिंग सीखते रहे. सन् 1946 में इसमें इंटर कॉलेज की स्‍थापना हुई जो बाद में हमीदिया कॉलेज के रूप में जाना गया. हमीदिया कॉलेज इस इमारत में 1956 तक लगता रहा. दिनांक 1 नवम्‍बर, 1956 से यह भवन विधान सभा के रूप में परिवर्तित हुआ. तब से लेकर अगस्‍त, 1996 तक यह भवन मध्‍यप्रदेश की चालीस वर्ष की संसदीय यात्रा का हमकदम और मध्‍यप्रदेश के लोकतांत्रिक इतिहास का साक्षी बना रहा.
          विधान सभा के कामकाज की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर मूल मिंटो हॉल में इमारतों के नये खण्‍ड जोड़ना पड़े. सन् 1980 तक यह महसूस किया जाने लगा था कि विधान सभा से जुड़े कामकाज के फैलाव को देखते हुए विधान सभा के लिए एक ऐसी इमारत की जरूरत है जिसमें सभी सहूलियतें तथा पर्याप्‍त जगह हो. दिनांक 14 मार्च, 1981 को तत्‍कालीन लोकसभा अध्‍यक्ष, श्री बलराम जाखड़ के हाथों नये विधान सभा भवन का शिलान्‍यास सम्‍पन्‍न हुआ. अरेरा पहाड़ी पर बिड़ला मंदिर और राज्‍य मंत्रालय के बीच 17 सितम्‍बर, 1984 को इस नये भवन का निर्माण प्रारंभ हुआ. नये भवन के निर्माण में कई तरह की रूकावटें आती रहीं और निर्माण का काम धीमी गति से चला. वर्ष 1994 के अन्‍त में तत्‍कालीन सरकार ने इस काम में तेजी लाने के लिए एक साधिकार समिति का गठन किया और उसे यह काम 18 महीने में पूरा करने की जिम्‍मेदारी सौंपी. साधिकार समिति ने निर्माण में आ रही सभी रूकावटों को दूर किया, सभी आवश्‍यक साधन जुटाये और समय-सीमा के भीतर नये भवन का निर्माण पूरा कर दिखाया. भवन की प्रारंभिक लागत 10 करोड़ रूपये अनुमानित थी, लेकिन 12 वर्षों में बनते-बनते इसमें आंतरिक साज- सज्‍जा, फर्नीचर, आधुनिक साउण्‍ड सिस्‍टम, वातानुकूलन, आधुनिक कैफेटेरिया एवं बगीचों का निर्माण व अन्‍य सुविधाओं को शामिल करने से इसकी लागत लगभग 54 करोड़ रूपये हो गई.
मध्‍यप्रदेश विधान सभा का वर्तमान भवन
          इस नए विधान सभा भवन का उद्घाटन दिनांक 3 अगस्‍त, 1996 को तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के कर कमलों से हुआ. भवन का नाम इंदिरा गांधी विधान भवन रखा गया है. इस भवन का डिजाइन विख्‍यात वास्‍तुविद् चार्ल्‍स कोरिया ने तैयार किया है. पूरा भवन वृत्‍ताकार है जिसका व्‍यास 140 मीटर है. समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 573.25 मीटर है. इसमें केन्‍द्रीय वातानुकूलन की व्‍यवस्‍था है. भवन को 6 सेक्‍टरों में बांटा गया है. भवन में विधान सभा के साथ-साथ विधान परिषद् के लिए हॉल बनाया गया है. यह हॉल सेक्‍टर एक में स्थित है जिसमें लगभग 90 सदस्‍यों के बैठने की व्‍यवस्‍था है इसमें अधिकारी दीर्घा, पत्रकार दीर्घा व दर्शक दीर्घाओं का प्रावधान है. परिषद् का आकार वर्गाकार है. हॉल की ऊंचाई 20 मीटर है इसकी छत स्‍पेस ट्रस की है. इसमें प्राकृतिक रोशनी आने की व्‍यवस्‍था है इसका फर्नीचर ''सडार वुड'' का है. मध्‍यप्रदेश में द्वितीय सदन की संवैधानिक व्‍यवस्‍था नहीं होने के कारण वर्तमान में इस हॉल का उपयोग सेमीनार एवं प्रशिक्षण हेतु किया जा रहा है. इसके प्रवेश द्वार पर ''जीवन वृक्ष'' नामक एक विशाल पेंटिंग है जिसमें प्रदेश के ऐतिहासिक स्‍थलों को दर्शाया गया है. सेक्‍टर एक में ही समिति कक्ष- 2 (अजन्‍ता), दलीय कार्यालय व माननीय नेता प्रतिपक्ष के कक्ष हैं. द्वितीय तल पर सचिवालय की शाखाएं लगती हैं.
सांची द्वार
          विधान परिषद् के ठीक सामने विधान सभा हॉल सेक्‍टर दो में स्थित है. इसका मुख्‍य प्रवेश द्वार सांची द्वार की तरह है. इस पर कोलाज का कार्य किया गया है. सभागृह की छत का आकार गुंबद का व्‍यास 31 मीटर, ऊंचाई लगभग 26 मीटर है. गुबंद में प्राकृतिक रोशनी आने की व्‍यवस्‍था है. इसमें अधिकारी दीर्घा एवं अध्‍यक्षीय दीर्घा भू-तल पर है. सदन से लगी हुई माननीय सदस्‍यों के लिए एक खूबसूरत लॉबी है जिसमें से पांच प्रवेश द्वार सदन में जाने के लिए हैं. एक छोटा सा कैफेटेरिया भी है. ऊपर की मंजिल में आठ दीर्घाएं हैं. इनमें दो पत्रकारों के लिए, दो सामान्‍य, एक राज्‍यपाल महोदय, एक अध्‍यक्षीय दीर्घा, एक महिला दीर्घा, एक प्रतिष्ठित दर्शक दीर्घा है. सभी दीर्घाओं में प्राकृतिक रोशनी आने की व्‍यवस्‍था है. सभावेश्‍म में आधुनिक श्रवण एवं इलेक्‍ट्रानिक मतदान प्रणाली लगी है. सभा के हॉल में 366 सदस्‍यों के बैठने की व्‍यवस्‍था थी. सन् 2000 में छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के गठन के बाद वर्तमान में 250 सदस्‍यों के बैठने की व्‍यवस्‍था है. वर्तमान संख्‍या 230 एवं एक नामजद सदस्‍य सहित कुल 231 सदस्‍य सदन में बैठते हैं सभा हॉल के समीप माननीय अध्‍यक्ष महोदय, माननीय उपाध्‍यक्ष व प्रमुख सचिव विधान सभा के कक्ष हैं. इमारत के मध्‍य में सेक्‍टर चार में दस हजार वर्गफीट क्षेत्रफल का 11 मीटर ऊंचा एक विशाल केन्‍द्रीय कक्ष है. इसकी छत चार स्‍तम्‍भों पर टिकी है. यह भवन का केन्‍द्र बिन्‍दु है और यह केन्‍द्रीय कक्ष भवन को चारों दिशाओं से जोड़ता है. इसमें प्राकृतिक रोशनी आने की उत्‍तम व्‍यवस्‍था है. केन्‍द्रीय कक्ष से लगा हुआ बैंक, पोस्‍ट ऑफिस, रेल्‍वे आरक्षण कक्ष, होम्‍योपैथी तथा आयुर्वेदिक चिकित्‍सालय हैं. ऐलोपैथिक चिकित्‍सालय मुख्‍य भवन के बाहर स्थित है.
पुस्‍तकालय का अंतरंग
          सेक्‍टर पांच में विधान सभा का वृहद् पुस्‍तकालय है जिसमें लगभग 1 लाख 82 हजार पुस्‍तकें तथा विभिन्‍न साहित्‍य संग्रहित हैं. पुस्‍तकालय के गांधी-नेहरू कक्ष में महात्‍मा गांधी तथा पंडित जवाहर लाल नेहरू की लिखी तथा इन पर लिखी गई विभिन्‍न लेखकों की पुस्‍तकें तथा साहित्‍य संग्रहीत है. पुस्‍तकालय को चार भागों में बांटा गया है. प्रथम दो भाग पुस्‍तकों के लिए हैं. महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकों को रखने के लिए काम्‍पेक्‍टर्स की व्‍यवस्‍था है. प्रथम तल पर माननीय सदस्‍यों के लिए वाचन कक्ष की व्‍यवस्‍था है.
          नये भवन के सेक्‍टर छ: में एक सभागार भी है जिसमें 600 लोग बैठ सकते हैं. इसकी छत सिविल इंजीनियरिंग की बेजोड़ कारीगरी है इसकी छत की कुल मोटाई 25 सेन्‍टीमीटर है. इसमें बीम नहीं है. इसकी छत के उच्‍चतम व न्‍यूनतम बिन्‍दु में 6 मीटर का लेबल अन्‍तर है. इसमें आधुनिक साउण्‍ड सिस्‍टम लगा हुआ है. व्‍ही.आई.पी. आगन्‍तुकों के सभागार में प्रवेश के लिए अलग से प्रवेश द्वार है.
विधान परिषद के द्वार पर गुलाम शेख की पेंटिंग जीवन वृक्ष
          भवन के सेक्‍टर तीन में मुख्‍यमंत्री कक्ष है. भू-तल व प्रथम तल पर मंत्री कक्ष, द्वितीय तल पर विधान सभा अधिकारियों के कक्ष व तीन समिति कक्ष हैं. सेक्‍टर तीन के कोर्ट यार्ड के मध्‍य में राष्‍ट्रीय चिन्‍ह अशोक स्‍तम्‍भ है जो कांसे का बना है. इसका वजन दो टन व ऊंचाई 12 फीट है.
          भवन में मंत्रियों के 57 कक्ष, 7 बड़े व 7 छोटे समिति कक्ष हैं. भवन में 300 कक्ष हैं व इनमें 350 दरवाजे और 1000 खिड़कियां हैं. भवन में 60 प्रसाधन कक्ष हैं. भवन के निर्माण में 26 लाख ईंट, 2 लाख 6 हजार बोरी सीमेन्‍ट और 1 हजार 650 टन लोहे का प्रयोग हुआ है. भवन के पश्चिमी द्वार पर कैफेटेरिया स्थित है. इसमें आधुनिक किचन मशीन लगाये गये हैं इससे व इसकी छत से भोपाल का विहंगम दृश्‍य बहुत ही मनोहारी दिखाई देता है. भोपाल के दोनों प्रसिद्ध ताल यहां से एक साथ दिखाई देते हैं.
          भवन के रूपाकार को दिशा देने वाली महत्‍वपूर्ण बातें हैं अरेरा पहाड़ी के शीर्ष पर इसका स्‍थान जिसके न्‍यूनतम एवं उच्‍चतम लेबल में 11 मीटर का अन्‍तर है जिसे इस कुशलता के साथ समायोजित किया गया है कि भवन के अन्‍दर भ्रमण करने के बाद भी इसका अहसास नहीं होता. भोपाल की मस्जिदें और भोपाल के निकट सांची का स्‍तूप, इन कारणों के अतिरिक्‍त सबसे महत्‍वपूर्ण कारक जिसने इसे आकार दिया वह था ''मंडल'' यह भारतीय मानस की वह ब्रह्माण्‍डीय अवधारणा है जिसमें क्रिया, कार्य और अंतरिक्ष समाहित है.
          भवन अपने संयोजन के स्‍थान के भीतर संजोये आकाश की तरह है. मंडल की ही तरह इसके नौ घटक हैं ये सभी एक केन्‍द्र के इर्द-गिर्द रचे गए हैं. केन्‍द्र से निकलने वाली दो धुरियों पर प्रशासनिक कार्यालय हैं और चारों कोनों पर विधान परिषद्, विधान सभा, सभागार और ग्रंथागार स्थित हैं. इस भवन की वास्‍तुकला भारतीय संस्‍कृति की परम्‍पराओं एवं आधुनिक तकनीक का सुन्‍दर समन्‍वय है. इस भवन में प्रवेश हेतु सात द्वार हैं. भवन के मुख्‍य प्रवेश द्वार पर कुंड की संरचना निर्मित है जो विधान सभा में होने वाले लोकतंत्र के यज्ञ को आभासित करती है. कुंड के पास की भित्तियों पर लोक कलाकारों द्वारा सुन्‍दर चित्र बनाए गए हैं. इसी के पास प्रदेश का एक जलीय नक्‍शा निर्मित किया गया है जिसमें 36 फीट लम्‍बी एवं 6 फीट ऊंची तथा 36 टन वजनी ग्रेनाइट में बनी मूर्ति स्‍थापित है. भवन में जगह-जगह पर ख्‍यातिनाम चित्रकारों की पेंटिग्‍स एवं पत्‍थर शिल्‍प रखे गए हैं जो भवन की सुन्‍दरता बढ़ाने में सहायक हैं. भवन को वास्‍तुकला के क्षेत्र में विश्‍व प्रसिद्ध आगा खां अवार्ड भी मिल चुका है.
मध्‍यप्रदेश विधान सभा भवन का एरियल व्‍यू
          भवन के बाहर 25 एकड़ में विभिन्‍न प्रजाति के वृक्षों के अतिरिक्‍त आम के 500 वृक्षों का बगीचा है इसके साथ ही एक पक्षी विहार भी बनाया गया है. यह पक्षी विहार विधान सभा भवन के नवनिर्मित पूर्वीद्वार के सम्‍मुख बना है. स्थिति की दृष्टि से यह विधान भवन और मंत्रालय के मध्‍य अवस्थित है. लगभग 4 एकड़ के क्षेत्रफल में फैले इस विहार में 6 प्राकृतिक पोखर हैं. इस विहार में मूलत: फायकस प्रजाति के वृक्ष हैं. इसमें बांस (ड्रॉफ्ट प्रजाति) के वृक्ष भी हैं जो ऊंचाई के मान से बांस की छोटी प्रजाति है. इस विहार के पोखरों के आस-पास सजावटी और मौसमी फूलों के पौधे लगाये गये हैं.
          मध्‍यप्रदेश विधान सभा ने अपने पचास साला सफर में एक ओर जहां देश के विधान मंडलों में अपनी एक विशिष्‍ट  पहचान बनाई है वहीं इस अर्से में यह विधान सभा प्रदेश के लोगों की तरक्‍की और खुशहाली के कार्यों का भी आधार बनकर उभरी. यूं तो किसी भी संस्‍था के जीवन में पचास वर्षों की अवधि कोई बड़ी नहीं होती क्‍योंकि संस्‍थाओं का जीवन वर्षों में नहीं सीमित किया जा सकता. वे विरासत भी होती है और परम्‍पराओं की वाहक भी. वर्तमान विधान सभा प्रदेश की बारहवीं विधान सभा है.
          हमारा संविधान लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और संसदीय शासन प्रणाली का आधार है इसके अनुसार कार्य संचालन की दृष्टि से विधायिका, कार्यपालिका तथा न्‍यायपालिका नामक तीन अंग स्‍थापित किये गये हैं. इन तीनों के अलग-अलग कार्यक्षेत्र निर्धारित है और सभी की अपनी-अपनी सीमाएं हैं. इनमें विधायिका की स्थिति अत्‍याधिक महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि वह जनता की इच्‍छाओं और आकांक्षाओं को समग्र रूप से प्रतिबिम्बित करती है. यही वह मंदिर है जो लोकतंत्रीय प्रक्रिया के माध्‍यम से गढ़ा जाता है और इसके शिल्‍पी जनता जनार्दन होते हैं. इस दृष्टि से भारत की संसद और राज्‍यों के विधान मण्‍डलों ने लोकतंत्रीय प्रक्रिया को एक नई आभा दी है और पूरे विश्‍व में हमारा देश सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है.
          लोकतंत्र को परवान चढ़ाने, जनता की आवाज बनने और प्रदेश को विकास की ऊंचाईयों तक ले जाने में मध्‍यप्रदेश विधान सभा की विशिष्‍ट भूमिका रही है. इस विधान सभा ने पिछले पचास वर्षों में विभिन्‍न कानूनों, संसदीय प्रक्रियाओं तथा संवैधानिक व्‍यवस्‍थाओं के द्वारा समाज के हर स्‍तर के लोगों को और प्रदेश के प्रत्‍येक कोने को स्‍पर्श किया है. इस विधान सभा ने इस अर्से में सरकारों को बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के मंत्र पर चलने के लिए प्रेरित किया है तथा जन-उपयोगी नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम बनाने तथा उन्‍हें क्रियान्वित करने के लिए निर्देशित भी किया है. जनता के दुख-दर्दों, कष्‍टों और समस्‍याओं को न केवल यहां शब्‍द मिले हैं अपितु उन्‍हें दूर करने के लिए सार्थक उपाय भी सुझाये गये हैं. यहां धीर-गंभीर, तर्क-वितर्क, कटाक्ष से परिपूर्ण चर्चाएं हुई तो वहीं हास्‍य-व्‍यंग की फुहारें भी गिरीं.
          हमें गर्व है कि हम उस सदन से जुड़े हैं जिसका पचास साला इतिहास गौरवशाली संसदीय उपलब्धियों से भरा हुआ है. हमें गर्व है कि इस सदन के पूर्ववर्ती सदस्‍यों ने अपने परिश्रम, लगन, समर्पण और त्‍याग से इस विधान सभा को लोगों की आशाओं का केन्‍द्र बनाया. इस अवसर पर हम प्रदेश के सभी पूर्व राज्‍यपालों और मुख्‍यमंत्रियों तथा इस विधान सभा के पूर्व अध्‍यक्षों एवं प्रतिपक्ष के नेताओं को उनके योगदान के लिए बहुत आदर के साथ स्‍मरण करते हैं.
          हम इस सदन के सदस्‍य रहे उन सभी महानुभावों का भी सम्‍मान के साथ स्‍मरण करते हैं जिन्‍होंने इसे अपनी उपस्थिति और कार्य व्‍यवहार से गौरवान्वित किया था. हम इस सदन की सदस्‍य रही उन विभूतियों का भी आदर के साथ स्‍मरण करते हैं जिन्‍होंने आगे चलकर राष्‍ट्रपति, राज्‍यपाल तथा केन्‍द्रीय मंत्रियों के पदों को सुशोभित किया. हम उन सभी के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्‍होंने मध्‍यप्रदेश विधान सभा में उत्‍कृष्‍ट संसदीय व्‍यवहार, प्रक्रियाओं और परम्‍पराओं की नींव रखी.
          सन् 1981 में मध्‍यप्रदेश विधान सभा के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर 16 और 18 सितम्‍बर को रजत जयंती समारोह मनाया गया. समारोह के मुख्‍य अतिथि तत्‍कालीन लोकसभा अध्‍यक्ष, श्री बलराम जाखड़ थे मुख्‍य समारोह डॉ. बलराम जाखड़जी के संबोधन से प्रारम्‍भ हुआ. समारोह को तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री, श्री अर्जुन सिंह और नेता प्रतिपक्ष, श्री सुन्‍दरलाल पटवा ने भी संबोधित किया. समारोह के दौरान पं. मथुरा प्रसाद दुबे को विधान सभा के गठन से रजत जयंती तक लगातार सदस्‍य निर्वाचित रहने पर ''विधान पुरूष'' का, विधायक, श्री मुंशीलाल को ''सजग विधायक'' के सम्‍मान से विभूषित करने के साथ ही विधान सभा के सचिव, श्री कौशल किशोर गुप्‍ता को भी सम्‍मानित किया गया. इसके अलावा प्रदेश के भूतपूर्व विधान सभा अध्‍यक्षों, उपाध्‍यक्षों, पूर्व मुख्‍यमंत्रियों और ग्‍यारह वरिष्‍ठ पत्रकारों को भी सम्‍मानित किया गया. समारोह की पूर्व संध्‍या 17 सितम्‍बर की शाम को शहनाई के जादूगर उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां ने शहनाई वादन और सुश्री सोनल मानसिंह ने नृत्‍य प्रदर्शन किया. दिनांक 18 सितम्‍बर की रात भी वादन और नृत्‍य को समर्पित थी. सरोद वादक उस्‍ताद अमजद अली खां का सरोद वादन, बिरजू महाराज का कथक और सुश्री शाश्‍वती सेन ने नृत्‍य प्रस्‍तुत किये. रजत जयन्‍ती समारोह के अन्‍य आकर्षणों में ठुमरी गायिका सुश्री गिरिजा देवी और नृत्‍यांगना स्‍वप्‍न सुन्‍दरी का नृत्‍य रहा. समारोह के अन्‍तर्गत डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की अध्‍यक्षता में कवि सम्‍मेलन का भी आयोजन हुआ जिसमें लब्‍ध प्रतिष्ठित कवियों, सुश्री इंदिरा इन्‍दु, सुल्‍तान मामा, रमणिका गुप्‍त, स्‍नेहलता स्‍नेह, सत्‍यनारायण सत्‍तन, सुरेश उपाध्‍याय, राजेन्‍द्र अनुरागी, मुकुट बिहारी सरोज, कृष्‍ण बिहारी नूर, रमानाथ अवस्‍थी, शरद जोशी, बालकवि बैरागी और बजेन्‍द्र अवस्‍थी ने रचना पाठ किया.
मध्‍यप्रदेश विधान सभा की रजत जयंती की सांस्‍कृतिक संध्‍या में दिनांक 17 दिसम्‍बर, 1981 को सुप्रसिद्ध शहनाई वादक, भारत रत्‍न उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान का शहनाई वादन.
समारोह के अन्‍तर्गत तीन विचारोत्‍तेजक संगोष्ठियां क्रमश: पार्लियामेन्‍टरी फार्म ऑफ डेमोक्रेसी एण्‍ड द प्रेसीडेंसियल सिस्‍टम, विधायिका के कार्यों में समितियों की प्रभावी भूमिका और विधायिका से जनसामान्‍य की अपेक्षाएं आयोजित की गई. पहली संगोष्‍ठी गुजरात के विधान सभा अध्‍यक्ष, श्री नटवरलाल सी. शाह, दूसरी संगोष्‍ठी राजस्‍थान, विधान सभा के अध्‍यक्ष, श्री पूनमचंद बिश्‍नोई और तीसरी संगोष्‍ठी, मध्‍यप्रदेश, विधान सभा के उपाध्‍यक्ष, श्री रामकिशोर शुक्‍ल की अध्‍यक्षता में सम्‍पन्‍न हुई.
          वर्ष 2006 के नवम् माह में विधान सभा अपने गठन के पचास वर्ष पूरे कर रही है. विधान सभा की स्‍वर्ण जयंती के कार्यक्रमों में विशेष उल्‍लेखनीय 17 जुलाई, 2006 को पावस सत्र के पहले दिन भारत के राष्‍ट्रपति महामहिम डॉ, ए. पी. जे. अब्‍दुल कलाम के द्वारा विधान सभा सदस्‍यों को दिया गया ऐतिहासिक सम्‍बोधन है. मध्‍यप्रदेश में विकास के ब्‍ल्‍यू प्रिंट के रूप में जाना और माना गया. यह ऐतिहासिक सम्‍बोधन मध्‍यप्रदेश विधान सभा के गौरवशाली पृष्‍ठों का स्‍वर्णिम पृष्‍ठ बना.
मध्‍यप्रदेश विधान सभा के स्‍वर्ण जयंती कार्यक्रमों के शुभारम्‍भ के अवसर पर दिनांक 17 जुलाई, 2006 को विधान सभा सदस्‍योंको अपना ऐतिहासिक संबोधन देते हुए भारत के राष्‍ट्रपति महामहिम डॉ. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम. राज्‍यपाल डॉ बलराम जाखड़ और विधान सभा अध्‍यक्ष श्री ईश्‍वरदास रोहाणी भी चित्र में दृष्‍टव्‍य हैं.
इस सम्‍बोधन के जरिये जहां प्रदेश के विकास का एक प्रादर्श प्राप्‍त हुआ. मध्‍यप्रदेश विधान सभा के अध्‍यक्ष, श्री ईश्‍वरदास रोहाणी बने. मध्‍यप्रदेश विधान सभा के स्‍वर्ण जयंती कार्यक्रमों का सिलसिला महामहिम राष्‍ट्रपति के सम्‍बोधन तक ही सीमित नहीं रहा. विधान सभा सचिवालय ने भोपाल के अलावा इन्‍दौर, ग्‍‍वालियर और जबलपुर में भी संसदीय विषयों पर अखिल   भारतीय स्‍तर की संगोष्ठियां आयोजित कर स्‍वर्ण जयंती समारोह को प्रदेश व्‍यापी स्‍वरूप दिया. अक्‍टूबर 2006 में सम्‍पन्‍न इन संगोष्ठियों में ख्‍याति प्राप्‍त संसदीय मर्मज्ञ, वरिष्‍ठ पत्रकार और राजनेता शामिल रहे. विधान सभा के स्‍वर्ण जयंती कार्यक्रमों का समापन दिनांक 31 अक्‍टूबर, 2006 को शीत सत्र के पहले दिन प्रदेश के महामहिम राज्‍यपाल डॉ. बलराम जाखड़ के  मुख्‍य आतिथ्‍य और मुख्‍यमंत्री, श्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में सम्‍पन्‍न हुआ. इस समारोह में प्रदेश के पूर्व और वर्तमान विधायकों और सांसदों को स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान किये गये. स्‍वर्ण जयंती के कार्यक्रमों के समापन के अवसर पर तीन दिवसीय सांस्‍कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये गये. इसके अन्‍तर्गत दिनांक 30 अक्‍टूबर को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और शास्‍त्रीय नृत्‍यांगना सुश्री हेमा मालिनी द्वारा द्रौपदी नृत्‍य नाटिका का मंचन मोतीलाल नहेरू स्‍टेडियम (लाल परेड ग्राउण्‍ड) पर किया गया.  दिनांक 1 नवम्‍बर, 2006 को विधान सभा भवन के मानसरोवर सभागार में अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन सम्‍पन्‍न हुआ. इस कवि  सम्‍मेलन में सर्वश्री बालकवि वैरागी, सत्‍यनारायण सत्‍तन, गजेन्‍द्र सोलंकी, सुनील जोगी, राजेश चेतन, प्रदीप चौबे और सुश्री रितु गोयल जैसे स्‍वनाम धन्‍य कवियों ने काव्‍यपाठ किया. सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों की श्रृखंला का अंतिम कार्यक्रम लोक नृत्‍य और लोक गायन भी मानसरोवर सभागार में ही 2 नवम्‍बर, 2006 को सम्‍पन्‍न हुआ.